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क्या छिन जाएगा चीन से दुनियां की फैक्ट्री होने का दर्जा?

– संजय कुमार सिंह, असिस्टेंट प्रोफेसर (पत्रकारिता एवं जनसंचारिता विभाग), बियानी ग्रुप ऑफ कॉलेज़ेज, जयपुर

कोरोना वायरस की शुरुआत चीन के वुहान शहर से हुई।कई रिपोर्ट्स हैं कि शुरुआत में चीन ने इस वायरस के मामलों को छिपाया।धीरे-धीरे कोरोना पूरी दुनिया में फैल गया और आज हालात ये हैं कि तीन लाख से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं। चीन की जवाबदेही तय करने की डिमांड दुनिया के कई देशों ने उठाई।अब चीन पर शिकंजा कसने की शुरुआत हो गई है।वहीं चीन का बचाव करने वाले वल्र्ड हेल्‍थ ऑर्गनाइजेशन की भूमिका भी तय होगी। भारत समेत दुनिया के 62 देशों ने कोरोना पर एक स्‍वतंत्र जांच की मांग की है।वल्र्ड हेल्‍थ असेंबली में यूरोपियन यूनियन की ओर से यह प्रस्‍ताव पेश कर मांग की गई है कि कोविड-19 को लेकर इंटरनेशनल हेल्‍थ रेस्‍पांस की निष्‍पक्ष, स्‍वतंत्र और विस्‍तृत जांच हो।चीन को पूरी दुनिया के गुस्से का सामना करना पड़ रहा है।इस नाराजगी की कीमत क्या उसे ‘दुनिया की फैक्ट्री का दर्जा गंवाकर चुकानी पड़ेगी? भारत को उम्मीद है कि चीन को जल्द ही दुनिया के मैन्यूफैक्चरिंग हब की अपनी हैसियत से हाथ धोना पड़ेगा। करीब 1000 कंपनियां कोरोनावायरस के चलते चीन से अपना कारोबार समेटने की तैयारी में हैं।कंपनियों को इसके लिए कोविड-19 से पैदा स्थिति के सुधरने का इंतजार है।

भारत में कई राज्य सरकारों ने श्रम कानूनों में संशोधन के पीछे मकसद भी ऐसी ही कंपनियों को लुभाना है। 1000 कंपनियों के कारोबार समेटने की तैयारी को चीन की बौखलाहट स्वाभाविक है और जाहिर है वो अपने तरीके से इसे काउंटर करने की पुरजोर कोशिश भी कर रहा है।अमेरिका और यूरोप की ये कंपनियां भारत के साथ ही साथ इंडोनेशिया, वियतनाम, ताइवान और मलेशिया में संभावनाएं तलाश रही हैं।यही वजह है कि चीन किसी न किसी तरीके से भारत सहित अन्य मुल्कों को विवाद में उलझाने की कोशिश कर रहा है।

अमेरिका के सीनेटर थोमटिलिस ने 14 मई को अपनी 18 सूत्री योजना को विस्तार से प्रस्तुत करते हुए कहा, चीन सरकार ने खराब मंशा से बातों को छिपाया और ऐसी वैश्विक महामारी फैलायी जो हजारों अमेरिकियों के लिए विपत्ति लेकर आई। यह वही शासन है जो अपने ही नागरिकों को श्रम शिविरों में बंद कर के रखता है, अमेरिका की प्रौद्योगिकी एवं नौकरियां चुराता है और अमेरिका के सहयोगियों की संप्रभुता के लिए खतरा उत्पन्न करता है। इसलिए चीन से सारी उत्पादन इकाइयां वापस अमेरिका लाई जाएं और धीरे-धीरे आपूर्ति श्रृंखलाओं को लेकर चीन पर निर्भरता समाप्त की जाए।जापान सहित कई देशों ने अपनी कम्पनियों को चीन से कारोबार समेटने को पहले ही कह दियाहै।

केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने एक इंटरव्यू में कहा है, ‘जहां तक मुझे पता है अगर ये वायरस नैसर्गिक होता तो वैज्ञानिकों को इसके बारे में पता होता।ये लैब में तैयार हुआ वायरस है।’चीन को भी ये बात अच्छी तरह मालूम हो चुकी है कि वो अमेरिका और यूरोप के निशाने पर तो है ही, एशिया के भीतर भी उसका बहुत बुरा हाल होने वाला है।

लॉकडाउन के दौरान ही भारत ने भी मेक इन इंडिया को नेक्स्ट लेवल पर ले जाने की तैयारी कर ही ली है।प्रधानमंत्री नरेंद्रमोदी ने तो कह ही दिया है कि लोकल को वोकल और फिर ग्लोबल बनाना है। 20 लाख करोड़ रुपये का आर्थिक पैकेज भी मोदी सरकार ने इसी मकसद से दिया है।अब जिस तरीके से  एमएसएमई  को प्रोत्साहित करने की सरकार की कोशिशें चल रही हैं और राज्य सरकारें श्रम कानूनों में संशोधन कर रही हैं, भारत जिन चीजों के लिए चीन पर निर्भर हुआ करता रहा वे अपने यहां ही तैयार होने लगेंगी। भारत के प्रति अब तक चीन ने जो भी संयम दिखाया है उसके पीछे बाजार पर उसकी नजर रही है वरना, अपनी तरफ से मुश्किलें खड़े करने से तो वो कभी भी पीछे नहीं हटा है।

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