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चिकनगुनिया के दर्द में राहत दिलाए फिजियोथैरेपी

एक मुलाकात डॉ. अनुज माथुर Physiotherapist, Jyoti Hospital, Jaipur

आज के दौर में जहां लोग बीमारियों के ईलाज के लिए कम से कम दवाईयों का उपयोग करना चाहते हैं, तो ऐसे में फि जियोथेरेपी हमारे लिए बहुत मददगार साबित हो सकती है। इसके बारे में विस्तार से जानने के लिए बियानी टाइम्स ने फि जियोथैरेपिस्ट डॉ. अनुज माथुर से बातचीत की –

1. फिजियोथैरेपी क्या है और ये बीमारियों के ईलाज में कैसे मदद करती है?
व्यायाम के जरिए मांसपेशियों को सक्रिय बनाकर किए जाने वाले इलाज की विधि फि जियोथैरेपी कहलाती है। चूंकि इसमें दवाइयां नहीं लेनी पड़ती, इसलिए इनके दुष्प्रभावों का प्रश्न ही नहीं उठता। लेकिन महत्वपूर्ण बात यह है कि फि जियोथैरेपी तब ही अपना असर दिखाती है, जब इसे समस्या दूर होने तक नियमित किया जाए।
2. फिजियोथैरेपी के द्वारा किसी भी प्रकार के दर्द में निजात पाने में कितना समय लगता है?
यह सब दर्द के प्रकार और रोगी की उम्र पर निर्भर करता है। अलग-अलग दर्द के लिए अलग-अलग एक्सरसाइज बताई जाती हैं। ऐज फे क्टर और बोन्स की कंडिशन पर भी निर्भर करता है कि दर्द कितने दिनों में ठीक होगा। अधिकांश तौर पर कम से कम 15 से 20 दिन फिजियोथैरेपी के लिए चाहिए होते हैं।
3. चिकनगुनिया के रोगियों को बढ़ती सर्दियों के साथ जोड़ों में दर्द और अकडऩ की समस्या रहती है, उनके लिए फिजियोथैरेपी कैसे काम आ सकती है?
जिन-जिन लोगों को चिकनगुनिया हो चुका है उन्हें जरूरी है कि वे मोबिलिटी बनाए रखें, ज्यादा देर तक लेटे रहने से हड्डियों में जकडऩ आ जाती है। फिजियोथैरेपी के जरिए हम जॉइन्ट मूवमेंट कराना सीखाते हैं। इसी के साथ इन्टीग्रेटेड हॉलिस्टिक हीलिंग थैरेपी भी काम में ली जाती है जिससे अंगों का संतुलन कायम करने, गतिशीलता बढ़ाने व मरीज की इच्छा शक्ति के साथ उसकी भागीदारी को शामिल किया जाता है। बढ़ी उम्र संबंधी समस्याओं और क्रॉनिक डिसऑर्डर के प्रबंधन में भी यह कारगर सिद्ध होती है।
4. फिजियोथैरेपी किन-किन तकलीफों में कारगर है?
लाईफ स्टाइल संबंधी परेशानी (मोटापा, ब्लड प्रेशर, डायबिटीज), क्लाइमेट चेंज से जुड़ी तकलीफें (लंबे समय तक दफ्तर में एसी में रहना, धूप के बिना रहने, लंबी सीटिंग आदि ऐसा वातावरण जो परेशानी को बढ़ाता है), मैकेनिकल एवं ऑर्थोपेडिक डिसऑर्डर (पीठ, कमर, गर्दन, कंधे, घुटने का दर्द या दुर्घटना के कारण भी), आहार-विहार (जोड़ों का दर्द, हार्मोन में बदलाव, पेट से जुड़ी समस्याएं), खेलकूद की चोटें, ऑर्गन डिसऑर्डर, ऑपरेशन से जुड़ी समस्याएं, न्यूरोलॉजिकल बीमारियां (मांसपेशिया में खिंचाव व उनकी कमजोरी), चक्कर आना, झनझनाहट, कंपन और बढ़ती उम्र संबंधी बीमारियों के कारण चलने-फिरने में दिक्कत, बैलेंस, टेंशन, हैडेक और अनिद्रा में फिजियोथैरेपी को अपना सकते हैैं।
5. कई बार मरीज कहते हैं कि फिजियोथैरेपी से कुछ फर्क ही नहीं पड़ा, इसका क्या कारण है?
इलाज से फायदा न हो तो देखना होता है कि मरीज के साथ निम्न में से कोई स्थिति तो नहीं है। फिजीशियन या सर्जन के स्तर पर मरीज को समय रहते फिजियोथैरेपिस्ट की सलाह दी गई थी या नहीं। उदाहरण के तौर पर घुटनों के दर्द का मरीज फिजियोथैरेपी में तब आता है जब ऑर्थोपेडिक सर्जन की राय में उसके घुटने लगभग खत्म हो चुके होते हैं। कमर और गर्दन के दर्द के मरीज भी तब आते हैं जब न्यूरो फिजिशियन सर्जन की राय में उनकी नसों की दबने से ताकत कम हो चुकी होती है ऐसे में फिजियोथैरेपी के दौरान की जाने वाली एक्सरसाइज भी उन्हें नहीं करवाई जा सकती इसलिए जरूरी है कि मरीज समय रहते फिजियोथैरेपिस्ट की सलाह ले।
6. आप बियानी टाइम्स के पाठकों को क्या सलाह देना चाहेंगे?
सर्दियों के मौसम में जोड़ों के दर्द और जकडऩ की समस्या भी ज्यादा रहती है इसके लिए रेगुलर वॉक पर जायें और एक्सरसाईज करेें जिससे मसल्स एक्टिव रहेंगी। अपने खान-पान का ध्यान रखें और सबसे बड़ी बात सकारात्मक सोच और दृढ़ इच्छा शक्ति को अपनी लाइफ स्टाइल में अपनायें।

 

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