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Editorial – शिक्षा, शादी और एंटरप्रेन्योरशिप

शिक्षा, शादी और एंटरप्रेन्योरशिप.

न दिनों हम सभी लोगों ने अपने पड़ोस व रिश्तेदारों के यहां शादी के आयोजनों को देखा व अनुभव किया है। हिन्दू संस्कृति के अनुरूप शुभ मूहुर्त निकालकर शादी की तिथियां तय की जाती हैं। एक ही दिन में एक ही शहर में सैकड़ों व हजारों शादी समारोह सम्पन्न हो रहे होते हैं। इस दौरान सडक़ो पर ट्रेफिक जाम की स्थिति बन जाती है। होटल तथा वैवाहिक स्थलों पर अत्यधिक दबाव बन जाता है। शायद हम सब लोग इन आयोजनों में अंधाधुंध नकल करने लग गए है। शादी के आयोजनों की पीछे मूल भावना को समझने के बजाए, शादी के आयोजनों को अपना स्टेट्स सिम्बल समझने लगे हैं। जरा सोचिए… एक निम्न व मध्यमवर्गीय परिवार को शादी के निमंत्रण के समय जब किसी धनी व्यक्ति द्वारा अत्यधिक आर्कषक व महंगा आमंत्रण पत्र पे्रषित किया जाता है तो उस निम्न व मध्यमवर्गीय परिवार पर क्या प्रभाव पड़ता है? कहीं ऐसा तो नहीं कि एक सम्पन्न व्यक्ति अपने से कम सम्पन्न व्यक्ति का मजाक बनाने लग गया है। इसके अलावा कहीं हम सब लोग बड़े व भारी-भारी कार्ड बनाने के कारण प्रकृति व पेड़ों का नुकसान तो नहीं करने लगे हैं। बात यहीं खत्म नहीं होती। इन दिनों यह देखा गया है कि इन विवाह समारोहों में व्यंजनों की संख्या में बेतहाशा रूप से वृद्धि हो गई है। इस होड़ की तो कोई सीमा ही नहीं रही है।
बहुत अच्छा हो यदि शादी शुभ मुहूर्त में कर शादी समारोह अन्य दिनों में आयोजित कर लिया जाये, जिससे सडक़ो पर लम्बी लाईन, ट्रेफिक जाम व भोजन की जूठन को कम किया जा सके। अभी कुछ वर्ष पूर्व माहेश्वरी समाज ने व्यंजनों की सीमा तक सीमित कर एक नई पहल की थी। परन्तु लगभग 1.5 वर्ष पश्चात पुन: किसी सम्पन्न व्यक्ति द्वारा इसे तोड़ दिया गया और फिर यह पहल भी दम तोड़ गई।
अगर हम मध्यमवर्गीय तथा उच्चवर्ग द्वारा इस अवसर पर किए जाने वाले खर्चों को औसत रूप से देखें तो पाएंगे कि एक दिन के आयोजन पर लगभग 20 से 25 लाख रूपए व्यय कर दिए जाते हैं। कितना अच्छा हो कि वर व वधु को एक सादगी भरे आयोजन के पश्चात अनावश्यक खर्चों से बची इस राशि को व्यवसाय आरम्भ करने की पूंजी के रूप में चेक बनाकर विवाह की रस्म अदायगी के बाद वर व वधु को दिया जाए ताकि उच्च या तकनीकी रूप से शिक्षित वर व वधू मिलकर अपना व्यवसाय स्थापित कर सके। ना सिर्फ स्वयं को आत्मनिर्भर बनाए, बल्कि अनेकों व्यक्तियों को रोजगार प्रदान करने का माध्यम भी बन जाए।
न्यूटन के नियम के अनुसार ‘जो भी क्रिया करते है उसकी प्रतिक्रिया होना निश्चित है’। कितना अच्छा हो कि जो अत्यधिक सम्पन्न व्यक्ति हैं वे व्यक्ति अपने आस-पास रह रहे व्यक्तियों व निर्धन रिश्तेदारों को इस अवसर पर आर्थिक रूप से सहायता पहुंचाए। वास्तव में हम सब ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना रखने वाली संस्कृति को मानने वाले लोग हैं। परन्तु हकीकत में हमारे आस-पास हो रही शादी समारोह मेंं ऐसा देखने को नहीं मिलता। युवाओं को इस दिशा में स्वयं निर्णय लेना होगा, क्योंकि माता-पिता समाज के डर से या अशिक्षा या पुराने रीति-रिवाजों में बंधे होने के कारण निर्णय नहीं ले पाते। ये निर्णय युवा पीढी को ही लेने होंगे और माता-पिता व समाज के प्रति उनके दृष्टिकोण को व्यवहारिक और व्यापक बनाना होगा।
हमारी शिक्षा व्यवस्था को भी देखा जाए तो इसे पूर्ण रूप से नौकरीपरस्त बना दिया गया है। हर उच्च शिक्षण संस्थान बड़ी-बड़ी नौकरियां दिलवाने का वादा करता है। कितना अच्छा हो कि ये उच्च शिक्षण-संस्थान युवाओ को एन्टरप्रेन्योर बनाने पर ध्यान देने लग जाए।
हाल ही में सरकार द्वारा स्किल डवलपमेंट की बात की जाने लगी है, लेकिन पहली जरूरत समाज को एन्टरप्रेन्योरशिप डवलप करने की है, क्योंकि यह एन्टरप्रेन्योर ही स्किल्ड लोगों को रोजगार प्रदान करेंगे। आइए, एन्टरप्रेन्योरशिप डवलप करने की दिशा में सकारात्मक प्रयास करने की ओर बढ़ें। शादी समारोह में दंभ व दिखावे के रूप में किए जाने वाले अनावश्यक खर्चों पर लगाम लगाकर इस राशि को वर व वधू के भावी व्यवसाय की पूंजी के रूप में प्रदान कर एक सकारात्मक पहल करें।
हम सभी को जलने व जलाने वाली होली के प्रथम दिन के स्थान पर प्यार व सम्मान के रूप रंगों के साथ खेलने वाली होली ही पसंद आती है। यह बताते हुए मुझे अत्यंत हर्ष हो रहा है कि इस अंक के साथ बियानी टाइम्स अपने 2 वर्ष पूर्ण कर रहा है।
मुझे विश्वास है कि आप सभी इसे रूचि से पढ़ते होंगे और इसका लाभ उठाते होंगे। मुझे और हमारी टीम को आपकी प्रतिक्रिया प्राप्त होगी, तो बहुत अच्छा लगेगा। हमारी पूरी टीम की तरफ से आपको होली की शुभकामनाएं। पे्रम स्नेह और सम्मान के साथ…

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