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Editorial – School Education & Teacher’s training

स्कूल शिक्षा व टीचर्स टे्रनिंग कॉलेजों में व्याप्त कमियों पर चर्चा करने के बजाए इन कमियों के पीछे व्याप्त कारणों व समाधान पर विचार करने की जरूरत है.

गत वर्षों में माध्यमिक शिक्षा बोर्ड, राजस्थान व सेन्ट्रल बोर्ड ऑफ सैकण्डरी एजुकेशन द्वारा स्कूल एजुकेशन में बहुत से परिवर्तन किये गये हैं। इनमें प्रथम तो कॉमन सिलेबस किया गया है और प्रेक्टिकल, क्रिएटिव लर्निंग व इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी को विशेष महत्व दिया जाने लगा है। यह देखने में आया है कि टीचर्स में इन परिवर्तनों के प्रति बहुत ही असंतोष व नकारात्मक सोच है। बहुत गौर से देखने से पता चलता है कि इसका मुख्य कारण टीचर्स में इन परिवर्तनों के कारण व उद्देश्यों के प्रति ट्रेनिंग व अवेयरनस की कमी है। दुसरी बात-यह देखा गया है कि राजस्थान राज्य में लगभग 37,321 प्राइवेट तथा 27,294 सरकारी स्कूल संचालित किए जा रहे हंै। यहां पर पढ़ाने वाले टीचर्स की मुख्य समस्या बड़ी हास्यास्पद है। सरकारी स्कूल में कार्य करने वाले टीचर्स बहुत अधिक सुरक्षित अनुभव करने लगे हंै और वह इतने अधिक निर्भय हो गये हैं कि पढ़ाने से परहेज करने लगे हंै और सरकार भी उनसे जनसंख्या व चुनाव संबंधी व सरकारी योजनाओं के कार्य अधिक कराने लगी है। इस प्रकार हम कह सकते हंै कि सरकारी स्कूलों में से कुछ स्कूलों को छोड़ दें तो वास्तविक स्थिति यह है कि वहां नाम मात्र की पढ़ाई हो रही है। दूसरी ओर प्राइवेट स्कूलों में कार्य करने वाले लगभग सभी टीचर्स का पूरा ध्यान सेकण्ड ग्रेड व थर्ड ग्रेड टीचर्स भर्ती की परीक्षाओं को पास कर सरकारी नौकरी पाने में लगा हुआ है। वे सब लोग भी बहुत अधिक सुरक्षित हो जाना चाहते हैं। इस प्रकार जहां सरकारी स्कूलों में पढ़ाई नाम मात्र की हो रही है, वहीं प्राइवेट स्कूलों में टीचर्स पूर्ण रूप से समर्पित नहीं हो पा रहे हैं। कितना अच्छा होता कि सरकार शिक्षा देने के लिये इन दोनों विकल्पों में से एक ही विकल्प का चयन करती, जो कि अधिक प्रासंगिक होता। कई बार उद्देश्य इस लिये भी पूरे नहीं होते क्योंकि उन्हें प्राप्त करने के तरीके ही ठीक नहीं होते हैं। सरकार अगर सरकारी स्कूलों पर किये जाने वाले खर्चों का पूरा या कुछ भाग सभी टीचर्स की सुरक्षा व वेलफेयर पर खर्च कर दे तो निश्चित रूप से सभी टीचर्स बच्चों के भविष्य व शिक्षा के प्रति एकनिष्ठ हो जायेंगे और शिक्षा में गुणात्मक सुधार सम्भव हो सकेंगे। तीसरी बात यह देखी गयी है कि सभी स्कूल लगभग अपना सारा ध्यान सिलेबस या पाठ्यक्रम पूरा कराने में ही लगाते हैं। बच्चों के व्यक्तित्व विकास के प्रति बहुत ही कम ध्यान दिया जा रहा है। अगर गौर से देखेें तो सेकण्डरी क्लासेज से ऊपर पढऩे वाले विद्यार्थियों में बहुत ही असंतोष है। वे स्कूल को बोझ स्वरूप समझने लगे हैं। चौथी बात टीचर्स ट्रेनिंग व्यवस्था की है। प्राइमरी टीचर्स बनने के लिए एस.टी.सी. पाठ्यक्रम निर्धारित है। इस पाठ्यक्रम की अवधि 2 वर्ष है तथा दो वर्षों की ट्रेनिंग के लिए निर्धारित कुल फीस 11,000 रूपए वार्षिक निर्धारित है। इसी प्रकार सीनियर टीचर्स बनने के लिए बी.एड. पाठ्यक्रम करना होता है जिसकी अवधि 1 वर्ष है तथा इस पाठ्यक्रम हेतु सरकार द्वारा निर्धारित फीस 22,450 रूपए है। यह फीस भारत वर्ष में संचालित विभिन्न राज्यों द्वारा निर्धारित फीस में सबसे न्यूनतम फीस है। कैसे कोई इस फीस से समय के अनुरूप योग्य शिक्षक तैयार कर पायेगा। इस कारण इन शिक्षण-प्रशिक्षण महाविद्यालयों में ना तो अच्छा इंफ्रास्ट्रक्चर है ना ही शिक्षकों को सम्मानजनक वेतन दिया जाता है। एक मजेदार तथ्य यह भी है कि राज्य सरकार जय नारायण व्यास विश्वविद्यालय से काउंसलिंग करवाती है तथा सभी फीस विश्वविद्यालय स्वयं जमा कर लेता है तथा तीन किश्तों में शिक्षण-प्रशिक्षण महाविद्यालयों को उन्हीं की राशि बड़ी मुश्किल से वापिस लौटाता है। देखने वाली बात यह है कि जुलाई में इन कॉलेजों की फीस, जो बच्चों से प्राप्त की गई थी, उसका भुगतान 15 जनवरी तक कुछ भी नहीं किया गया है। इस कारण इन शिक्षण-प्रशिक्षण महाविद्यालयों को चलाना तथा प्रशिक्षकों को वेतन का भुगतान करना मुश्किल हो गया है। टीचर्स टे्रनिंग स्कूल जहां फीस व सरकारी व्यवस्थाओं से त्रस्त हंै, तो सरकारी अधिकारी व जन साधारण इन स्कूलों में सुविधाओं के अभाव से त्रस्त हंै। जबकि गौर से देखें तो नीतियों और व्यवस्थाओं में ही बहुत सी कमियां हैं। एक और रोचक तथ्य यह है कि गत 10 वर्षों में जहां मंहगाई दर औसतन 5.5 प्रतिशत प्रतिवर्ष बढ़ रही है वहीं इन कॉलेजों के शिक्षण शुल्क में राज्य सरकार द्वारा किसी तरह की भी बढ़ोतरी नहीं की गई है। इस प्रकार जहां डॉक्टर तैयार करने में सरकार द्वारा निर्धारित न्यूनतम फीस 15 लाख आता है और इंजीनियर बनाने में सरकार द्वारा निर्धारित न्यूनतम फीस 8 लाख रूपए है, वहीं टीचर्स टे्रनिंग पर खर्च मात्र 22,000 रूपए निर्धारित किया गया है। इस प्रकार टीचिंग प्रोफेशन को सबसे कम महत्वपूर्ण मान लिया गया है। अक्सर लोग टीचर्स टे्रनिंग कॉलेजों में व्याप्त कमियों पर चर्चा करते हुये बहुतायत से मिल जायेंगे पर कम लोग हैं जो इन कमियों के पीछे व्याप्त कारणों व समाधान पर विचार करने को तैयार होते हैं। इस प्रकार यह कहें कि हमारे राज्य में स्कूल शिक्षा में मुख्य कारक टीचर्स हंै तथा उनकी टे्रनिंग के लिये जो कोर्सेज् निर्धारित हैं, उनकी गुणवत्ता को पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया गया है। किसी ने सही ही कहा है कि किसी राज्य की प्रजा का व्यवहार सबसे अधिक राजा के व्यवहार से जाना जा सकता है। इसी प्रकार किसी बच्चे का व्यवहार व स्वभाव उसके पिता के व्यवहार व स्वभाव से पता लगाया जा सकता है। ठीक उसी प्रकार स्कूल में पढऩे वाले बच्चे का व्यवहार व स्वभाव टीचर्स के व्यवहार व स्वभाव से जाना जा सकता है। जैसी टीचर्स की टे्रनिंग में समझ होगी ठीक उसी अनुरूप विद्यालय व महाविद्यालय में शिक्षा का स्तर होगा। नया साल बहुत से बदलाव लेकर आ रहा है। आशा है कि शिक्षा के क्षेत्र में भी सुधार की प्रक्रिया आरंभ होगी।
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