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जबरिया जोड़ी || Movie Review

बिहार में एक कुप्रथा है ‘पकड़वा बियाह’। इसमें होता ये है कि जब किसी गरीब परिवार लडक़ी की शादी में दहेज देने के लिए पैसे नहीं होते, तो वो लडक़ा पसंद करते हैं और उन्हें किडनैप करवाकर अपनी बेटी की शादी करवा देते हैं। लडक़े की मर्जी के खिलाफ। इसी प्रथा पर बेस्ड है फिल्म ‘जबरिया जोड़ी’ थिएटर्स में लग चुकी है।

एक बाहुबली परिवार का लडक़ा है अभय सिंह। दहेज मांगने वाले लोगों को किडनैप कर उनकी शादी करवाता है क्योंकि यही उसके पापा का बिजऩेस है, दूसरी ओर एक लडक़ी है बबली, जो मिडल क्लास की तीखे तेवर वाली लडक़ी है उसे देखकर आपको इशकज़ादे की ज़ोया याद आ जाती है. अंतर बस ये है कि जोया के रिबेल होने का कोई मतलब था, यहां वो ढूंढ़े भी नहीं मिलता।

अभय और बबली बचपन से प्यार करते हैं. लेकिन अभय बड़ा होने के बाद पॉलिटिक्स में जाना चाहता है। इसलिए प्यार-शादी के चक्कर में नहीं पडऩा चाहता। इसलिए वो बबली से प्यार करने के बावजूद अपनी फीलिंग्स छुपाता है लेकिन बबली अभय के साथ शादी करना चाहती हैं। अभय इस झोल-झाल से निकलने के लिए बबली की जबरिया शादी का बयाना ले लेता है। फिर आगे की जो फिल्म है, वो अभय और बबली की इसी धर-पकड़ में निकलती चली जाती है।

फिल्म में सिद्धार्थ मल्होत्रा ने अभय सिंह का रोल किया है। सिद्धार्थ की सबसे अच्छी बात ये है कि वो इस बार कॉन्फिडेंट नजऱ आते हैं। शायद इसलिए क्योंकि ये उनके कैरेक्टर की डिमांड थी। दूसरी ओर हैं परिणीति चोपड़ा, उनके हिस्से एक ही कायदे का सीक्वेंस आता है,

बाकी फिल्म में वो इंतज़ार ही करती रहती हैं। संजय मिश्रा ने बबली के पिता दुनियालाल का रोल किया है। वो एक बेबस बाप के रोल में हैं, जिसकी बेटी उसके हाथ से निकल गई है। कोई शादी करने को तैयार नहीं है। वो एकमात्र किरदार हैं, जिन्हें देखकर लगता है कि ये फिल्म वाकई सोशल ड्रामा है। जावेद जाफरी ने फिल्म में अभय के पिता का रोल किया है, एक तरह से वो फिल्म के मोरल विलेन हैं। उनकी बिहारी हिंदी सुनकर लगता है कोई हरयाणवी आदमी अभी कुछ ही दिन पहले बिहार आया है। चंदन रॉय सान्याल का किरदार वैसा है, जैसे रेगुलर हीरो के बेस्ट फ्रेंड के दिमाग में थोड़ी अक्ल डाल दी जाए।

इस फिल्म को देखते समय आपको ‘शुद्ध देसी रोमांस’ और ‘हंसी तो फंसी’ जैसी फिल्में याद आती हैं। एक के बाद हो रहीं गैर-ज़रूरी चीज़ें फिल्म को खत्म भी नहीं होने देती। इसलिए ये फिल्म बहुत लंबी लगती है।

‘जबरिया जोड़ी’ एक कुप्रथा को छूकर सिर्फ उसकी पॉपुलैरिटी बढ़ाने का काम करती है। क्योंकि उसमें इतनी गंभीरता नहीं है कि वो पकड़वा बियाह को गलत प्रथा साबित कर पाए। आजकल सोशल इशू पर बनी फिल्में देखी जाती हैं, ‘लुका छुपी’ की तरह ये फिल्म भी सिर्फ उसी ट्रेंड को कैश करने की कोशिश है।

– शुभमशुक्ला
(रेडियोजॉकी, रेडियोसेल्फी ९०.८ एफएम)

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