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किशोर मन की सबसे बड़ी आवश्यकता-पे्रम

इस माह गुडग़ांव के रेयान पब्लिक स्कूल के ग्यारहवीं कक्षा के छात्र द्वारा परीक्षा टालने के लिए दूसरी कक्षा के छात्र की हत्या करना व जयपुर के निजी स्कूल के पूर्व छात्रों द्वारा अपनी ही स्कूल पर बम फेंकने की घटना सामने आई। किशोरावस्था में इस तरह के अपराधिक और मानसिक विकार हमें यह सोचने पर मजबूर कर देते हैं कि हमारी बुनियादी शिक्षा व देखभाल में कहीं ना कहीं कोई बड़ी चूक हो रही है। माता-पिता जहां बच्चों की शिक्षा और संस्कार की जिम्मेदारी स्कूल व कॉलेज की समझते हैं, वहीं स्कूल व कॉलेज माता-पिता एवं घर के वातावरण को जिम्मेदार बताकर अपना पल्ला झाड़ लेते हैं।
हम सभी लोगों ने बौद्धिक ज्ञान और जानकारी को शिक्षा समझ लिया है। वास्तव में बौद्धिक ज्ञान तो वह धारदार चाकू है, जिसे स्थिर हाथों में ना रखा जाए तो स्वयं के शरीर को काट डालता है। इन दिनों राजस्थान के लगभग ९००० चिकित्सकों द्वारा 7 दिनों के लिए सामूहिक हड़ताल पर जाना व इस कारण लाखों मरीजों को परेशानी व मौत की खबरें चर्चा में रही तथा इस घटना में चिकित्सकों एवं सरकार की संवेदनशीलता को भी देखा गया।
क्या हमने कभी सोचा है कि इतना बड़ा प्रबुद्ध वर्ग ऐसा किस कारण करता है? इन सभी प्रश्नों का उत्तर ढूंढा जाना बहुत ही आवश्यक है क्योंकि इन सभी प्रश्नों क ी गहराई में हमारे आने वाले भविष्य की आहट दिखाई दे रही हैं। आईये इन घटनाओं के बाद हम एक ऐसी घटना पर रोशनी डालें जो कि मर्यादा पुरूषोत्तम भगवान राम के जीवन से संबंधित है। रावण के वध के पश्चात उल्लेख मिलता है कि भगवान श्रीराम अयोध्या पहुंचने से पहले हिमालय की गुफाओं में स्थित अगस्त्य मुनि के आश्रम में इस बात का पश्चाताप करने पहुंचे कि दशानन रावण के दस मुख में से एक मुख ज्ञान, सत्य व पे्रम से परिपूर्ण था। जिसे मजबूरन भगवान श्रीराम को काटना पड़ा। आज हमारी आधुनिक शिक्षा प्रणाली में सत्य, पे्रम, व करूणा के भाव खत्म होते जा रहे हैं तथा हम सभी जीवन की जानकारियों व बुद्धि के आधार पर तर्क व प्रयोगों के आधार पर समझना चाहते है। यदि हम वास्तव में इन स्वस्थ एवं संवेदनशील समाज की स्थापना करना चाहते है तो हमें बाहरी जानकारी व प्रयोगों की बजाय खुद को ही खोजना होगा।
अब समय आ गया है, जब हम बच्चों को सरकारी व निजी क्षेत्र में बड़े पैकेज दिलाने वाली शिक्षा से पहले मूल्य आधारित शिक्षा पर जोर दें ओर इसके लिए शिक्षकों व माता-पिता को सामूहिक प्रयास करने होंगें।
सबसे महत्वपूर्ण यह है कि माता-पिता अपने बच्चों के साथ अपने स्वयं के जीवन के गहरे अनुभवों को साझा करें। किशोर मन की सबसे बड़ी आवश्यकता पे्रम है। पे्रम की कमी के कारण ही किशोर सेाशल मीडिया पर सक्रिय हो जाता है। दूसरी ओर पिछले 10 वर्षों में मैने स्वयं सैंकड़ों स्कूलों व कॉलेजों में छात्रों व अध्यापकों से संवाद किया है व मुझे यह अनुभव हुआ कि सिलेबस पर आधारित वर्तमान शिक्षा पद्धति में हमारा सम्पूर्ण ध्यान बुद्धि व तर्क पर केन्द्रित हो गया है तथा स्कूल व कॉलेज में जीवन से संबंधित नैतिक शिक्षा को पूर्णत: बड़े स्तर पर लागू किया जाना बहुत ही आवश्यक है। आज भी देश में सबसे बड़ा सुझाव आर्थिक, सामाजिक व तकनीकी क्षेत्र की बजाय सबसे बड़ा सुधार शिक्षा के क्षेत्र में किये जाने का हैं। अगर हम चाहते है कि वृद्धावस्था में हम हंसी खुशी अपने परिवार के साथ शांति में जीवन गुजार सकें तो आज से ही इस विषय पर विचार करना आरंभ करना होगा। प्रेम, स्नेह व सम्मान के साथ….

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