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इंसानियत की मिसाल बना MP के 200 युवाओं का ग्रुप

अंजलि तंवर

मध्य प्रदेश के कुछ युवाओं ने लोगों की मदद के लिए मुहिम शुरू की। इस मुहिम का नाम ‘सहयोग’ है। इसमें मध्य प्रदेश से 200 से ज्यादा युवा जुड़े हैं। पिछले 6 महीने में ही ये लोग हजारों लोगों की मदद कर चुके हैं।

भारत में हर साल करीब 1.4 करोड़ यूनिट ब्लड की जरूरत होती है, लेकिन सिर्फ 1.1 करोड़ यूनिट ब्लड ही मिल पाता है। कोविड महामारी में इस पर और भी बुरा असर पड़ा है। इस दौरान वॉलंटरी ब्लड डोनेशन न के बराबर हुआ।

कई लोगों ने संक्रमण के डर से ब्लड डोनेट नहीं किया। जिसका असर कोरोना की दूसरी लहर में देखने को मिला। लोग ब्लड के लिए इधर-उधर अस्पतालों में भटकते दिखे। कई जगहों पर तो बेड, ऑक्सीजन, और प्लाज्मा जैसी चीजों की भी किल्लत थी।

क्या हैसहयोग’?

‘सहयोग’ मध्यप्रदेश के 200 से ज्यादा युवाओं का एक ग्रुप है। कोरोना की दूसरी लहर से लेकर अब तक प्रदेशभर के ये युवा मरीजों की मदद कर रहे हैं। बेड, ऑक्सीजन, ब्लड, दवा, भोजन, अंत्येष्टि का सामान जैसी चीजें लोगों तक पहुंचा रहे हैं। महामारी के इस मुश्किल दौर में सोशल मीडिया के जरिए बना ये ग्रुप 24 घंटे अपनी सेवाएं दे रहा है।

इस ग्रुप को शुरू करने वालों में से एक शुभम चौहान बताते हैं, ‘ पिछले साल 20 अप्रैल को इस ग्रुप की शुरुआत हुई थी। उस दौरान भारत में कोरोना का कहर था। सरकार लगातार कोशिशें कर रही थी, लेकिन जिंदगी और मौत के बीच भागदौड़ कर रहे लोगों को जानकारी नहीं थी कि सुविधाओं तक कैसे पहुंचा जाए।

चुनौतियां इतनी बड़ी थीं कि एक-दूसरे की मदद किए बिना चीजें बेहतर नहीं हो सकती थीं। सभी को एक-दूसरे के सहयोग की जरूरत थी और यहीं से इस ग्रुप को नाम मिला और शुरुआत हुई। अलग-अलग क्षेत्रों में काम कर रहे युवा अपना सहयोग देने आगे आए और अब इस प्लेटफॉर्म के जरिए हजारों लोगों की मदद कर रहे हैं।

कैसे काम करता है सहयोग?

‘सहयोग’ नाम से सोशल मीडिया पर इन लोगों ने अपना पेज बनाया है। वहां ग्रुप का फोन नंबर भी दिया गया है। ब्लड डोनेशन की प्रोसेस बताते हुए टीम के मेंबर अभिलाष ठाकुर बताते हैं, ‘हमारे पास जैसे ही ब्लड की डिमांड आती है, हम तुरंत काम पर लग जाते हैं।

किसी भी केस को लेने से पहले हम उसे वैरिफाई करते हैं। इस प्रोसेस में हम अटेंडर से हॉस्पिटल का रिक्वायरमेंट लेटर मांगते हैं। जिससे मरीज के साथ केस की भी पूरी जानकारी मिल सके। वेरिफिकेशन के बाद जिस शहर से डिमांड आ रही है, वहां के वॉलंटियर्स को इन्फॉर्म किया जाता है।

हमने 5 टीम बनाई हैं। इसमें बेड रिस्पॉन्स टीम, प्लाज्मा डेटा टीम, ऑक्सीजन सिलेंडर टीम, ब्ल्ड अरेंजमेंट टीम और वेरिफिकेशन टीम शामिल हैं। सभी से कोऑर्डिनेट करने का काम वेरिफिकेशन टीम करती है, जिससे किसी भी प्रकार का कन्फ्यूजन न हो और काम पूरी रफ्तार से चलता रहे।

टीम सबसे पहले अपने आस-पास के लोगों में डोनर ढूंढने की कोशिश करती है, नहीं मिलने पर अन्य लोगों से कॉन्टैक्ट किया जाता है।

जैसे ही डोनर लोकेशन पर पहुंचने को तैयार हो जाते हैं, हम वाॅलंटियर के साथ उन्हें लोकेशन पर पहुंचा देते हैं। ब्लड फ्री में लोगों तक पहुंचाया जाता है। क्लिनिक की फीस या तो मरीज का परिवार देता है या फिर लोगों द्वारा दान में दिए गए पैसे से दी जाती है।

ब्लड डोनेशन के बाद हमारी टीम में शामिल जूनियर डॉक्टर लोगों को एडवाइस देते हैं कि खुद को हाइड्रेट रखें, आयरन इनटेक बढ़ाएं और ज्यादा से ज्यादा आराम करें।

परेशानियां और इनके समाधान

इस काम के दौरान ‘सहयोग’ के टीम मेंबर्स को कई परेशानियों का भी सामना करना पड़ता है। अंकित बताते हैं, ‘ब्लड डोनेशन केस में सबसे ज्यादा परेशानी एसडीपी (सिंगल डोनर प्लेटलेट्स ) डोनेशन के दौरान होती है।

एसडीपी के दौरान कई बार डोनर की नस नहीं मिलती या प्लेटलेट्स काउंट डिमांड के हिसाब से कम रह जाते हैं। ऐसे में हमें कई बार सिर्फ एक पेशेंट के लिए 8-10 डोनर ढूंढने पड़ते हैं। इस वजह से टेस्ट के दौरान फीस और मेहनत दोनों चीजें डबल हो जाती हैं, लेकिन हमारी टीम कभी भी पीछे नहीं हटती और इन चुनौतियों का सामना कर लोगों तक ब्लड पहुंचाती है।

 

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