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‘धोरों की बेटीÓ के साहस की कहानी

धोरों के किनारे बसा है राजस्थान का नागौर जिला, वहीं है एक छोटा सा गांव भवादिया, जहां की बेटी मेजर दीपिका राठौड़ ने दो बार माउंट एवरेस्ट पर फतह पाकर राजस्थान का गौरव बढ़ाया है। दीपिका राजस्थान की पहली और इंडियन आर्मी की इकलौती महिला है, जिन्होंने ये र्कीतिमान रचा था। ज्वैल्स ऑफ राजस्थान के इस भाग में आइए जानतें हैं उनके साहस और संघर्ष की कहानी-
बचपन व पारिवारिक पृष्ठभूमि: दीपिका उस एरिया से सम्बन्ध रखती है, जहां बेटियों को स्कूल नहीं भेजा जाता था, अगर कोई भेजता भी था तो पांचवीं या आठवीं तक पढ़ाने की औपचारिकता निभाकर इतिश्री कर लेता था। लेकिन दीपिका ने ना केवल आगे पढ़ाई की, बल्कि भारतीय सेना ज्वॉइन करने के साथ दो बार एवरेस्ट पर चढ़के जीत का झंडा भी लहरा दिया। दीपिका के नाना आर्मी में थें, वो जब छोटी थीं, तो अपने नाना को फ ौजी कपड़ों में देखकर एक्साइडेड होती थीं, फिर स्कूल, कॉलेज के दिनों में एनसीसी से जुड़ गई।
आर्मी में सफ र: आर्मी में सीधे लेफ्टिनेंट पद पर पहुंचीं दीपिका राठौड़ बाद में कैप्टन बनीं, उसके बाद उन्हें मेजर का पद मिला। दीपिका के अनुसार देशभक्ति का जज्बा उनमें एनसीसी के दौरान हीे पैदा हुआ। उसके बाद ही उन्होंने आर्मी में जाने का फै सला कर लिया था। इसके लिए उनके माता-पिता ने उनका पूरा सर्पोट किया।ऑल इंडिया माउंट एवरेस्ट एक्पिडेक्शन के तहत कई ऊंची चोटियों पर चढऩें वाली राजस्थान की एकमात्र एनसीसी छात्रा होने का गौरव भी उन्हें मिल चुका है।
डर का सामना करने की तकनीक : डर सबको लगता है। समुद्रतल से 29,029 फ ीट की ऊंचाई, शरीर को गला देने वाली ठंड और लडख़ड़ाते हुए कदमों की स्थिति में लगने वाले डर को केवल मानसिक शक्ति से ही हराया जा सकता है। दीपिका का डर से लडऩे का फ ार्मूला उनका ईश्वर पर विश्वास और मेडिटेशन के द्वारा अपनी मानसिक शक्ति को बढ़ाना है।
संदेश: महिलाओं को अपनी जिम्मेदारी समझते हुए देश हित में अपना योगदान करना चाहिए। इसके लिए जरूरी नहीं है कि वे रक्षा क्षेत्र में हीे जाएं। अन्य क्षेत्रों में भी देश हित में भागीदार बना जा सकता है।

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