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हनुमान जी से सीखें मैनेजमेंट भाग; 2

वास्तविकता की स्वीकारोक्ति आत्मविश्वास का आधार
हनुमानजी में कहीं भी अपनी वास्तविकता को छिपाने का प्रयास नहंी मिलता। उन्हें जहां भी मौका मिलता है या वे जहां भी जरूरी समझते हैं, अपने इस वानरपन की खुलेआम घोषणा करते हैं।
खायऊँ फल प्रभु लागी भूखा। कपि सुभाव ते तोरेऊँ रूखा।।
हे महाराज, मुझे भूख लगी थी, इसलिए मैंने फल खाए। चूंकि मैं वानर हूं और वानर का स्वभाव ही पेड़ों को तोडऩा होता है, इसीलिए मैनें आपका बाग उजाड़ा। इतने बलशाली बावजूद वहां वे खुद को विनम्रता के साथ महज एक छोटे से वानर के रूप में घोषित कर रहे हैं। यहीं हमें यह बात देखनी है कि जब व्यक्ति वास्तविकता को स्वीकार करके उससे मुक्ति पाने के लिए कुछ करने लगता है, तो उसके अंदर शक्ति की ज्वालाएं फूटने लगती हैं। यही स्वीकारोक्ति आत्त्मविश्वास का आधार बन जाती है, आत्मशक्ति का कारण बन जाती है। यह पलायन कराने वाली कमजोरी नहीं रह जाती।
यदि कोई रावण की तरह स्वयं को दुनिया का श्रेष्ठ ज्ञानी समझने लगे तो जाहिर है कि उसे और ज्यादा जानने की जरूरत ही नहीं रहेगी। जहां विकास रूकता है, वहीं से विनाश की शुरुआत हो जाती है, यह प्रकृति का नियम है। जैसे ही फल पक जाता है, वह बढऩा छोड़कर गलना शुरु कर देता है। इसलिए श्रेष्ठता की भावना से ग्रसित व्यक्ति आगे कुछ नहीं कर पाते और जो कुछ भी उनके हाथ में होता है, वह भी धीरे-धीरे खोने लगता है। जबकि अपनी कमजोरियों से वाकिफ व्यक्ति, जरा भी संवेदनशील है, थोड़ा भी जागरूक और समझदार है, तो वह इससे मुक्ति पाने के लिए अंदर ही अंदर बुरी तरह से छटपटाता रहता है। उसकी यही छटपटाहट, उसकी यही बेचैनी उसको कुछ न कुछ करने के लिए प्रेरित करती है। बात बहुत साफ है कि जब वह कर्म करने को आगे आता है तो कर्म करते-करते कहीं का कहीं पहुंच जाता है। ऐसे ही लोग जिंदगी में कुछ पाकर जाते हैं।
अपनी शक्तियों का अहसास करें
मन ‘कनवर्टरÓ होता है। बाहर की चीजों को अदंर किस रूप में भेजा जाए, यह काम हमारा यह मन ही करता है। इसीलिए किसी भी काम में कोई किस सीमा तक सफल हो पाएगा, यह इस बात पर निर्भर करता है कि उस काम के साथ उसके मन का तालमेल कितना बैठ पा रहा है। जामवंत द्वारा हनुमानजी को कराया गया उनकी शक्ति का एहसास इसका उदाहरण है। दूसरे वानरों की तरह हनुमानजी भी चुपचाप बैठे हुए थे। उन्हें अपनी दिव्य शक्ति का आभास नहीं था क्योंकि उनका स्वभाव राम भक्ति में मग्न रहना ही था। जामवंत उन्हें याद दिलाते हैं कि तुम चूंकि पवनपुत्र हो, इसलिए तुम्हारे पास वायु जैसी शक्ति है। तुम्हारे पास बुद्धि है, विवेक है और सबसे बडी बात यह है कि विज्ञान भी है। जिसके पास भी इनका खजाना हो, भला उसके लिए दुनिया का कौन-सा काम कठिन हो सकता है?
जिन आंतरिक गुणों की जरूरत होती है, वे सब हनुमाान के पास है। हमने देखा कि उनके पास बुद्धि है, विवेक है और विज्ञान भी है। कार्य की आवश्यकता-बुद्धि जाग्रत, सकारात्मक या नकारात्मक, विवेक जाग्रत, कार्य किस तरह किया जाए कि असफल न हो यह विज्ञान है। जिसके पास ये तीनों होंगे, स्वाभाविक रूप से ही वह बहुत संतुलित हो जाएगा, बहुत ही व्यावहारिक और बहुत ही धैर्यवान होकर चट्टान की तरह स्थित हो जाएगा। ऐसे चट्टानी मन वाले व्यक्ति ही जिन्दगी में करिश्मे करते हैं।
काम के प्रति श्रद्धा
जिसके प्रति आदर की भावना पैदा हो जाती है, कभी-कभी हम उसमें भी मीन-मेख निकालने लगते हैं। लेकिन जिसके प्रति श्रद्धा की भावना पैदा हो जाती है, तो मीन-मेख निकालने की कोई गुंजाइश नहीं रहती। सामान्यत: यह श्रद्धा व्यक्तियों के प्रति होती है। कल्पना करके देखिए कि यदि यही श्रद्धा अपने काम के प्रति हो जाए तो फिर क्या होगा। सामान्यत: अभी तक आपने यही पढ़ा होगा कि अपने काम से प्रेम करो। हनुमान जी का चरित्र सिखाता है कि अपने काम के प्रति श्रद्धा का भाव पैदा करो। इसलिए तो जब भी कोई कठिन काम होता था, वे हमेशा रघुनाथ को ही अपने ह्रदय में बसाकर चलते थे क्योंकि सम्पूर्ण समर्पित व्यक्ति ही सम्पूर्ण ऊर्जा का अधिकारी होता है।
ज्ञान और गुण की महत्ता
हनुमानजी के चरित्र की सबसे बड़ी विशेषता उनका शक्तिमान होना ही नहीं बल्कि उनका ज्ञान के साथ- साथ गुण का भी सागर होना है। ज्ञान तो एक प्रकार से आग की तरह है। आप इस आग से आरती की बत्ती जला सकते हैं, चूल्हे की लकडिय़ां जला सकते हैं और यदि चाहें तो किसी का घर भी जला सकते हैं। हनुमान भी असफल हो जाते, यदि वे केवल ज्ञान के ही सागर होते तो। लेकिन वे कभी असफल नहीं हुए, क्योंकि वे ज्ञान के साथ-साथ गुणों के भी सागर थे। गुण का अर्थ उस चरित्र से है, उस प्रवृत्ति से है, जिसके आधार पर कोई भी अपने इस ज्ञान का उपयोग करता है और ज्ञान को विज्ञान में परिवर्तित कर देता है।
इमोशनल इंटेलीजेंस : व्हाय इट कैन मैटर मोर दैन आईक्यू।
व्यक्ति का अपने अनुभवों को समझना, उन पर नियंत्रण रखना और अपने उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए उनका सर्वोत्तम उपयोग करना एवं जिज्ञासा को निरंतर बनाये रखना।

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