Thursday , September 21 2017
Home / Education / गुलाबो सपेरा: मौत पर जिंदगी की जीत

गुलाबो सपेरा: मौत पर जिंदगी की जीत

साक्षात्कारकत्र्ता :
दीक्षा कंवर, दीक्षा सक्सेना
अदिति शर्मा, स्फूर्ति सिंह, योगिता

कहावत है ‘जाको राखे सांईयां, मार सके ना कोईÓ, कई बार कहावतें पन्नों से निकलकर जिंदगी की हकीकत बन जाती हैं। सच भी है, अगर मन में कुछ कर दिखाने का हौसला और जुनुन हो तो सफ लता ऊंचाईयों के मुकाम को पा ही लेती हैं। ऐसी ही कहानी है, राजस्थान की सपेरा नृत्यांगना, ‘गुलाबो सपेराÓकी। देश-विदेश में अपनी पहचान बनाने के लिए उन्हें हाल ही में पद्म श्री अवार्ड से नवाजा गया। बियानी टाइम्स की टीम से बात करते हुए उन्होंनें अपनी कहानी कुछ यूं बयां की-
धनवंती से लेकर पद्मश्री गुलाबो तक के सफ र को आप कैसे देखती हैं?
३ भाई और ५ बहनों में ७वां नम्बर मेरा था। हमारे समाज में ज्यादा लड़कियां पैदा होना सही नहीं माना जाता था। इसलिए जब धनतेरस के दिन मेरा जन्म हुआ, तब पिताजी घर पर नहीं थे और इसका फ ायदा उठाकर समाज के लोगों ने मुझे जिंदा दफ ना दिया था, लेकिन भगवान ने कुछ और ही सोच रखा था। मेरी मौसी ने मुुझे बाहर निकाला और दूसरा जीवन दिया। मेरा बचपन अभावों में गुजरा। मैं पिताजी की लाडली थी। उन्होंने ही मुझे ‘गुलाबोÓ नाम दिया।
कालबेलिया डांस को आपने पहचान दी, आपके जीवन में इसकी शुरूआत कैसे हुई?
कालबेलिया डांस, जिसे मैं सपेरा डांस कहती हूं की शुरूआत मैंने ही की। मेरे पिताजी सपेरे का काम करते थे। मैं भी उनके साथ बाहर जाती थी। पिताजी बीन बजाते थे, मैं उस धुन पर सांपों के साथ नाचती थी। जिसमें मैं सांप की तरह लहराती थी। जब मैंनें इस नृत्य की शुरूआत की, तो उस समय लोग उसके बारे में ज्यादा जानते नहीं थे। लेकिन धीरे धीरे मेरे काम को पहचान मिलने लगी और मैं शो करने लगी। मेरे प्रयास रंग लाए और सरकार ने भी मेरी मदद की। आज कालबेलिया डांस देश-विदेश में पहचाना जाता है।
१९८५ में जब वाशिंगटन के फे स्टिवल ऑफ इंडिया कार्यक्रम में हिस्सा लेने के लिए आप पहली बार विदेश जा रही थी, तब कितना मुश्किल था, एक १४ साल की लड़की के लिए, जब उसे विदेश जाने के एक दिन पहले पता चला कि पिताजी अब इस दुनिया में नहीं रहे?
जिस दिन मुझे वांशिगटन जाना था, उसके एक दिन पहले मुझे मेरे घर ले जाया गया , जहां पहुंचकर मुझे पता चला कि मेरे पिताजी अब इस दुनिया में नहीं रहे। ये सुनकर और घर के हालात देखकर मैं पूरी तरह से टूट गई। लेकिन कुछ देर बाद मैंने अपने आप को संभाला और पिताजी क ा नाम प्रसिद्ध करने की मन में ठान ली। कोई क्या कहेगा और क्या सोचेगा इन बातों के बारे में बिना सोचे और पिताजी की यादों को मन में और उनके सपनों को अपनी आंखों में बसाकर मैं रात को ही वहां से निकल गई।
नेशनल टीवी के रियलिटी शो ‘बिग बॉसÓ में रहने का अनुभव कैसा रहा?
वहां मुझे बहुत कुछ सीखने को मिला। जीतने के लिए कोई किस हद तक दूसरों का दुश्मन बन सकता है और ऐसे लोगों के साथ कैसे रहा जा सकता है। मैं हमेशा महिलाओं के हक के लिए लड़ती आई हूं। मैं महिलाओं के खिलाफ साजिश कैसे कर सकती थी। इसलिए मैं वहां ज्यादा दिन नहीं टिक पाई।
आप अपनी सफलता का श्रेय किसे देना चाहती है ?
कहा जाता है हर सफ ल पुरूष की सफ लता के पीछे एक महिला का हाथ होता है।लेकिन मेरी सफ लता के पीछे दो पुरूषों का हाथ है। मेरी सफलता का सबसे बड़ा श्रेय मैं अपने पिताजी को देना चाहती हूँ। शादी के बाद मेरी सफलता के पीछे मेरे पति का सबसे बड़ा सहयोग रहा।
आप बियानी टाइम्स के पाठकों को क्या संदेश देना चाहेंगी?
मैं बियानी टाइम्स के पाठक ों को कहना चाहूंगी कि लड़कियों को बोझ ना समझें, आप लक्ष्मी, सरस्वती और पार्वती जिन देवियों की पूजा करते हैं, बेटियां इन्हीं का रूप है। बेटे तो एक कुल का नाम रोशन करते हैं, लेकिन बेटियां दो-दो कुलों को रोशन करती हैं।

Check Also

केंद्रीय विद्यालयों में इस साल से ऑनलाइन होगी दाखिला प्रक्रिया भाषा की रिपोर्ट, पंकज विजय द्वारा संपादित , अंतिम अपडेट: February 15, 2017 11:50

नव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा संचालित केंद्रीय विद्यालयों में सभी दाखिले आगामी शैक्षाणिक सत्र से …